Wednesday, May 11, 2011

नरसिंह पद व पुष्पांजली


नरसिंह पद 
शोडष भुज प्रभुराज शोभतो .दैत्य मांडीवरी ,कोळे नरसिहपुरी  नरहरी ॥धृ ॥
श्री कृष्णेच्या डोहामा जी  | वसती करिसी हरी | सोडूनी सुख -माधुरी | क्षीर सागरी नित्य वास तव | म्हणुनी का आवडे वस्ति जलाभ्यांतरी |
अतिपरिचय होता चि अवज्ञा होते खरी | ऐसे बुध म्हणती किती तरी | म्हणुनी काय वैकुंठ तुला ते | त्याज्य वाटते हरी | कितीदा अवतरसी महीवरी |
स्वर्गीचे सुख तुच्छ मानिसी | देखुनि अवनीवरी | प्रेम ते सद्भक्तांचे हरी | 
                                         ऐशाच एक भक्ताचे पाहुनी |
                                    करि पिता हाल जे रागे निशि दिनी |
                                  कळवळूनि जासि तू जेव्हा निजमनी |
  गरुडा साठी थांबसि नच तुं | पायिच धावसी हरी | स्तंभी प्रगटसि नरकेसरी || षोडश || १ ||

     यज्ञ याग तप सर्व लोपले । धर्म कुणी न आचरी । ऐसी स्थिती या अवनीवरी । माळा घालूनी गळा लावूनी । टिळे बहु विधा जरी । प्रभूसी स्मरे न मुळी पळ भरी । कथेतुनी हरिदास सांगती । "मायालोभ न धरी" । लक्ष परी सर्व बिदागीवरी । चौवर्णांचा आचार सुटला । सत्पथ कुणीना वरी । असत्या भी नच मुळी वैखरी । यदा यदा धर्माची ग्लानी । होते त्या अवसरी । बहुविध अवतारा मी धरी । गोप कुलोद्भव ऐसे श्रीमत । भगवत गीतांतरी । बोलला सत्य सत्य वैखरी । 
                            जाणोनी ऐसा धर्मलोप जाहला ।
                             रक्षणी तयाच्या जावे ऐसे तुला ।
                            वाटले, म्हणुनी का येसी या महितला ।
   श्रीरामाच्या सन्निध वसती । केली कृष्णातिरी । कोळे नरसिंहपुरी नरहरी ।।२।।

   स्वप्नी जाऊनी द्विजोत्तमाच्या । कथिसी " घे मज वरी । असे मी कृष्णा डोहांतरी "। " कुठे शोधू मी अथांग वारी । अंत न लागे हरी । पसरे द्वादश योजन वरी "। "काष्ठ जलाश्रीत सहजचि जेथे । अग्नी प्रगटीत करि । वास मम त्याच जलाभ्यंतरी" ।
   भीमनृपतिचे सहाय्य घेउनी । द्विज घे प्रतिमा वरी । पराशर ध्यायी जी अंतरीं । सवे काढिल्या तीन आणखी । प्रतिमा त्या अवसरी । पांचवी भयाभीत त्या करी । वायूसुताची ती मूर्ती मुखी । ज्वाला धारण करी । भयांकित सर्वं लोक अंतरी ।
                                                    जाळील विश्व हि मूर्ती जाणुनी ।
                                                      सोडिली पुन्हा जलामध्यें नेऊनि ।
                                                      परतले प्रभूची मूर्ती घेउनी ।
        अश्वत्थांचे छायेखाली । घेत विसावा हरी । तारण्या हीनदीन कितीतरी ।। षोडश ।।३।।

       संत शिरोमणी नामदेवकुल । याच ठायीं वाढले । तयांचे पार साक्ष देतसे । सिद्धेश्वर महाराज राहिले । याच पुण्यभूमधें । मगरीने आसन ज्यांना दिले । भैरवनाथ सगरेश्वरासह । पूर्वभागीं ठाकला । पश्चिमी केशवराजची भला । उत्तरेस तो असे मछींदर । नाथ पहाडावरी । तुझा जणू वाटे पहारेकरी । दक्षिण भागी रामचंद्रप्रभू । ध्यानधारणा करी । बसुनिया सुरम्य बेटावरी समर्थकरीची हनुमंताची । मूर्ती इथे शोभते । बाहुनी सरिता आडवीतसे । "बाहुक्षेत्र " म्हणोनी म्हणती । सुरम्य स्थानासी या महिमा किती वर्णुं येथला ।

                      जन्मोनी ऐशा पवित्र भूमीमधें ।
                                         अन करुनी स्नाना कृष्णाडोहामध्ये ।
                                         देखुनी प्रभूचें रूप भूयारामध्ये । 
      मुक्त  होई नर भवपंकातुनी ।सत्य असे हे जरी । का नच भगवंता उद्धरी ।।४।।



पुष्पांजली 
परार्थ तनु हि गळो,सकाळ दुष्ट वृत्ती जळो।
विशुद्ध यश ना मळो,सतत संत संगा मिळो।
सुखात मति ना घळो,सुमति ईश नामी रुळो ।
नृसिंह  तवरूपा कळो,अभय दान  आम्हा मिळो ।
प्रभो ! नरहरे! वसो सतत ध्यान तुझे मनी ।
म्हणून नित येऊ दे विविध दुःख  संजीवनी ।
सुखात विजयी फसे,विपदि  मात्र नामी ठसे ।
नृसिंह  चरणी  असे  सुमन पुष्प अर्पितसे।



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